Apni Ram Rasoyi(अपनी राम रसोई)

‘अपनी राम रसोई’ लेखक सुशोभित की एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक कृति है, जिसमें भारतीय समाज, संस्कृति, लोकजीवन, भोजन, स्मृतियों और मानवीय संबंधों का अत्यंत आत्मीय चित्रण किया गया है। पुस्तक का शीर्षक केवल भोजन या रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन-दर्शन, साझी संस्कृति और आत्मीयता का प्रतीक बनकर सामने आता है। लेखक भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, सेवा और सामाजिक समरसता का माध्यम मानते हैं।

पुस्तक में विभिन्न प्रसंगों, संस्मरणों और अनुभवों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि भारतीय रसोई केवल स्वाद का संसार नहीं, बल्कि परिवार, परंपरा और संस्कारों का केंद्र भी है। लेखक बताते हैं कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और खान-पान से होती है। इसी कारण वे पारंपरिक व्यंजनों, लोकरीतियों और उनसे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सहज और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत करते हैं।

सुशोभित अपने अनुभवों के माध्यम से यह भी बताते हैं कि भोजन बाँटने की परंपरा समाज में अपनत्व और विश्वास को मजबूत करती है। पुस्तक में अनेक स्थानों पर गरीबों, यात्रियों, साधुओं और जरूरतमंद लोगों के प्रति सेवा-भाव का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय संस्कृति के “अतिथि देवो भव” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे आदर्शों को जीवंत करता है। लेखक आधुनिक जीवन की भागदौड़ में पारिवारिक आत्मीयता और सामूहिक भोजन की घटती परंपरा पर भी चिंता व्यक्त करते हैं।

सरल, भावपूर्ण और साहित्यिक भाषा में लिखी गई यह पुस्तक पाठकों को अपनी जड़ों, लोकसंस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है। ‘अपनी राम रसोई’ केवल भोजन पर आधारित पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन के सांस्कृतिक, सामाजिक और भावनात्मक पक्षों का सजीव दस्तावेज़ है। यह पाठकों को प्रेम, सेवा, सहअस्तित्व और साझा संस्कृति के महत्व का बोध कराते हुए जीवन में संवेदनशीलता, उदारता और मानवीय रिश्तों की गरिमा बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

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ISBN : 9789389245196

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Publication: Divyansh Publications
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‘अपनी राम रसोई’ लेखक सुशोभित की एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक कृति है, जिसमें भारतीय समाज, संस्कृति, लोकजीवन, भोजन, स्मृतियों और मानवीय संबंधों का अत्यंत आत्मीय चित्रण किया गया है। पुस्तक का शीर्षक केवल भोजन या रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन-दर्शन, साझी संस्कृति और आत्मीयता का प्रतीक बनकर सामने आता है। लेखक भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, सेवा और सामाजिक समरसता का माध्यम मानते हैं।

पुस्तक में विभिन्न प्रसंगों, संस्मरणों और अनुभवों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि भारतीय रसोई केवल स्वाद का संसार नहीं, बल्कि परिवार, परंपरा और संस्कारों का केंद्र भी है। लेखक बताते हैं कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और खान-पान से होती है। इसी कारण वे पारंपरिक व्यंजनों, लोकरीतियों और उनसे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सहज और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत करते हैं।

सुशोभित अपने अनुभवों के माध्यम से यह भी बताते हैं कि भोजन बाँटने की परंपरा समाज में अपनत्व और विश्वास को मजबूत करती है। पुस्तक में अनेक स्थानों पर गरीबों, यात्रियों, साधुओं और जरूरतमंद लोगों के प्रति सेवा-भाव का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय संस्कृति के “अतिथि देवो भव” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे आदर्शों को जीवंत करता है। लेखक आधुनिक जीवन की भागदौड़ में पारिवारिक आत्मीयता और सामूहिक भोजन की घटती परंपरा पर भी चिंता व्यक्त करते हैं।

सरल, भावपूर्ण और साहित्यिक भाषा में लिखी गई यह पुस्तक पाठकों को अपनी जड़ों, लोकसंस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है। ‘अपनी राम रसोई’ केवल भोजन पर आधारित पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन के सांस्कृतिक, सामाजिक और भावनात्मक पक्षों का सजीव दस्तावेज़ है। यह पाठकों को प्रेम, सेवा, सहअस्तित्व और साझा संस्कृति के महत्व का बोध कराते हुए जीवन में संवेदनशीलता, उदारता और मानवीय रिश्तों की गरिमा बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

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Sushobit

सुशोभित 13 अप्रैल 1982 को मध्यप्रदेश के झाबुआ में जन्म। शिक्षा-दीक्षा उज्जैन से। अँग्रेजी\r\nसाहित्य में स्नातकोत्तर। एक साल पत्रकारिता की भी अन्यमनस्क पढ़ाई की।\r\nकविता की चार पुस्तकें \'मैं बनूंगा गुलमोहर\', \'मलयगिरि का प्रेत\', \'दुःख की\r\nदैनन्दिनी\' और \'धूप का पंख\' प्रकाशित। लोकप्रिय फ़िल्म-गीतों पर पुस्तक \'माया\r\nका मालकौंस\', किस्सों की किताब \'माउथ ऑर्गन\', रम्य-रचनाओं का संकलन\r\n\'सुनो बकुल\', महात्मा गाँधी पर पुस्तक \'गाँधी की सुंदरता\' और जनपदीय जीवन की\r\nकहानियों का एक संकलन \'बायस्कोप\' भी प्रकाशित। अंतःप्रक्रियाओं की पुस्तक\r\n\'कल्पतरु\' ताज़ा कृति। यह ग्यारहवीं किताब। अंग्रेज़ी के लोकप्रिय उपन्यासकार\r\nचेतन भगत के छह उपन्यासों और स्पैनिश कवि फ़ेदरीको गार्सीया लोर्का के पत्रों की\r\nएक पुस्तक का अनुवाद भी किया है।\r\n\'सुनो बकुल\' के लिए वर्ष 2020 का स्पंदन युवा पुरस्कार।
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