Pracheen Bharat Ki Vidushi Mahilaai(प्राचीन भारत की विदुषी महिलाएँ)

‘प्राचीन भारत की विदुषी महिलाएँ’ डॉ. सत्य सिंह द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण शोधपरक पुस्तक है, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं की शिक्षा, ज्ञान, विद्वत्ता और सामाजिक योगदान का विस्तृत एवं प्रमाणिक विवेचन किया गया है। पुस्तक यह स्थापित करती है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को केवल परिवार तक सीमित नहीं माना जाता था, बल्कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करने, शास्त्रार्थ करने, दर्शन, साहित्य, धर्म और विज्ञान जैसे विषयों में दक्षता हासिल करने के अवसर भी प्राप्त थे।

लेखक ने वैदिक और उत्तरवैदिक काल की अनेक विदुषी महिलाओं, जैसे गार्गी वाचक्नवी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, घोषा, अपाला और विश्ववारा आदि के जीवन एवं योगदान का विस्तार से वर्णन किया है। इन विदुषियों ने वेद, उपनिषद और अन्य ग्रंथों के अध्ययन-अध्यापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा अपने ज्ञान और तर्कशक्ति से समाज को नई दिशा प्रदान की। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि इन महिलाओं ने दार्शनिक संवादों और धार्मिक विमर्शों में पुरुष विद्वानों के साथ समान स्तर पर भाग लिया।

डॉ. सत्य सिंह प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था, गुरुकुल परंपरा तथा महिलाओं के बौद्धिक अधिकारों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि उस समय ज्ञान को लिंग के आधार पर सीमित नहीं किया गया था। साथ ही लेखक यह भी बताते हैं कि समय के साथ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में आए परिवर्तनों के कारण महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई और उनकी शिक्षा तथा स्वतंत्रता पर अनेक प्रतिबंध लग गए।

सरल, तथ्यपूर्ण और शोधपरक शैली में लिखी गई यह पुस्तक भारतीय इतिहास के उस पक्ष को उजागर करती है, जिसे लंबे समय तक अपेक्षित महत्व नहीं मिला। ‘प्राचीन भारत की विदुषी महिलाएँ’ पाठकों को यह समझने की प्रेरणा देती है कि भारतीय संस्कृति में नारी सदैव ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता की प्रतीक रही है। यह कृति नारी शिक्षा, समानता और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी और प्रेरणादायक ग्रंथ है।

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ISBN : 9789389245813

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Publication: Divyansh Publications
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‘प्राचीन भारत की विदुषी महिलाएँ’ डॉ. सत्य सिंह द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण शोधपरक पुस्तक है, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं की शिक्षा, ज्ञान, विद्वत्ता और सामाजिक योगदान का विस्तृत एवं प्रमाणिक विवेचन किया गया है। पुस्तक यह स्थापित करती है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को केवल परिवार तक सीमित नहीं माना जाता था, बल्कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करने, शास्त्रार्थ करने, दर्शन, साहित्य, धर्म और विज्ञान जैसे विषयों में दक्षता हासिल करने के अवसर भी प्राप्त थे।

लेखक ने वैदिक और उत्तरवैदिक काल की अनेक विदुषी महिलाओं, जैसे गार्गी वाचक्नवी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, घोषा, अपाला और विश्ववारा आदि के जीवन एवं योगदान का विस्तार से वर्णन किया है। इन विदुषियों ने वेद, उपनिषद और अन्य ग्रंथों के अध्ययन-अध्यापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा अपने ज्ञान और तर्कशक्ति से समाज को नई दिशा प्रदान की। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि इन महिलाओं ने दार्शनिक संवादों और धार्मिक विमर्शों में पुरुष विद्वानों के साथ समान स्तर पर भाग लिया।

डॉ. सत्य सिंह प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था, गुरुकुल परंपरा तथा महिलाओं के बौद्धिक अधिकारों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि उस समय ज्ञान को लिंग के आधार पर सीमित नहीं किया गया था। साथ ही लेखक यह भी बताते हैं कि समय के साथ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में आए परिवर्तनों के कारण महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई और उनकी शिक्षा तथा स्वतंत्रता पर अनेक प्रतिबंध लग गए।

सरल, तथ्यपूर्ण और शोधपरक शैली में लिखी गई यह पुस्तक भारतीय इतिहास के उस पक्ष को उजागर करती है, जिसे लंबे समय तक अपेक्षित महत्व नहीं मिला। ‘प्राचीन भारत की विदुषी महिलाएँ’ पाठकों को यह समझने की प्रेरणा देती है कि भारतीय संस्कृति में नारी सदैव ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता की प्रतीक रही है। यह कृति नारी शिक्षा, समानता और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी और प्रेरणादायक ग्रंथ है।

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Dr Satya Singh

Dr. Satya Singh is an Indian educationist, researcher, and author known for writing on education, child development, and psychology. Through his books, he presents educational concepts in a simple, practical, and student-friendly manner. His works focus on child psychology, teaching methodologies, and educational development, making them valuable for B.Ed., D.El.Ed., CTET, TET, and other teacher education students. His writing combines theoretical knowledge with practical insights, helping readers understand the psychological and developmental aspects of children effectively.
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